पीडियाट्रिक हाइपरटेंशन: क्यों बच्चों में बढ़ रहा है हाई ब्लड प्रेशर का खतरा?

अक्सर हम हाई ब्लड प्रेशर (Hypertension) को बुजुर्गों या तनावग्रस्त वयस्कों की बीमारी मानते हैं। लेकिन हाल के वर्षों में एक चौंकाने वाला बदलाव देखा गया है—अब छोटे बच्चों और किशोरों में भी

पीडियाट्रिक हाइपरटेंशन

के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।

बदलती जीवनशैली, जंक फूड का बढ़ता सेवन, कम होती शारीरिक सक्रियता और शुरूआती स्क्रीनिंग की कमी ने इस गंभीर स्थिति को एक ‘पब्लिक हेल्थ’ से जुड़ी चिंता का विषय बना दिया है। दरअसल पीडियाट्रिक हाइपरटेंशन पर अक्सर लोगों का ध्यान नहीं जाता। शुरुआती चरण में इसके लक्षण बहुत कम दिखते हैं। लेकिन समय रहते इसका इलाज नहीं किया जाए, तो यह लंबे समय तक चलने वाली गंभीर हेल्थ प्रॉब्लम का कारण बन सकती है, जिसमें बड़े होने पर दिल की बीमारी, किडनी से जुड़ी समस्याएं और स्ट्रोक शामिल हैं।

पीडियाट्रिक हाइपरटेंशन के प्रकार

पीडियाट्रिक हाइपरटेंशन को मोटे तौर पर दो भागों में बांटा गया है:

1. प्राइमरी हाइपरटेंशन- यह आमतौर पर बड़े बच्चों और किशोरों में देखा जाता है। यह लाइफस्टाइल

से जुड़े कारणों जैसे मोटापा, शारीरिक निष्क्रियता, अनहेल्दी खाने की आदतें और हाइपरटेंशन की फैमिली हिस्ट्री से संबंधित होता है।

2. सेकेंडरी हाइपरटेंशन- यह छोटे बच्चों में ज़्यादा होता है और किसी अंदरूनी मेडिकल कंडीशन के कारण बच्चों में इसकी स्थिति बनती है। सेकेंडरी हाइपरटेंशन किडनी की बीमारी, जन्मजात दिल की बीमारियां, हार्मोनल डिसऑर्डर या कुछ दवाओं के इस्तेमाल से हो सकता है।

इस बारे में, उजाला सिग्नस रेनबो हॉस्पिटल, आगरा की पीडियाट्रिक कंसल्टेंट डॉ. आकांक्षा अरोड़ा ने बच्चों के हाइपरटेंशन से जुड़े कई ज़रूरी सवालों के जवाब दिए हैं।

बच्चों का हाइपरटेंशन बड़ों के हाइपरटेंशन से कैसे अलग है ?

बच्चों का हाइपरटेंशन बड़ों की तरह फिक्स्ड ब्लड प्रेशर नंबर के बजाय उम्र, जेंडर और हाइट परसेंटाइल के आधार पर तय किया जाता है। बच्चों में, हाई ब्लड प्रेशर अक्सर किसी अंदरूनी बीमारी की वजह से होता है, जबकि बड़ों का हाइपरटेंशन आमतौर पर प्राइमरी होता है। किसी बच्चे को हाइपरटेंशन तब होता है जब तीन अलग-अलग मौकों पर उसकी उम्र, जेंडर और हाइट के हिसाब से ब्लड प्रेशर की रीडिंग 95वें परसेंटाइल या उससे ज़्यादा हो। रीडिंग की तुलना स्टैंडर्ड पीडियाट्रिक ब्लड प्रेशर परसेंटाइल कर्व से की जाती है। कभी-कभी बच्चे में इसके अंदरूनी कारण का पता लगाने के लिए, डॉक्टर ब्लड और यूरिन टेस्ट, ECG, इकोकार्डियोग्राफी और रीनल अल्ट्रासाउंड जैसी और जांच की भी सलाह दे सकते हैं।

बच्चों में ब्लड प्रेशर की कैटेगरी

नॉर्मल: 90th पर्सेंटाइल से नीचे

बढ़ा हुआ: 90th–95th पर्सेंटाइल

हाइपरटेंशन: 95th पर्सेंटाइल से ऊपर

बच्चों में हाई ब्लड प्रेशर के सामान्य कारण क्या हैं ?

बच्चों में हाई ब्लड प्रेशर के आम कारणों में किडनी की बीमारियाँ, जन्मजात दिल की बीमारियाँ, एंडोक्राइन डिसऑर्डर, मोटापा या ज़्यादा वज़न, सुस्त लाइफस्टाइल, ज़्यादा नमक और जंक फ़ूड खाना, फिजिकल एक्टिविटी की कमी, ज़्यादा स्क्रीन टाइम, जेनेटिक वजहें, नींद का खराब पैटर्न, स्ट्रेस और स्टेरॉयड और स्टिमुलेंट जैसी कुछ दवाएँ शामिल हैं।

हाइपरटेंशन वाले बच्चों में माता-पिता को किन लक्षणों पर ध्यान देना चाहिए ?

कई बार बच्चों में हाई ब्लड प्रेशर के लक्षण नहीं दिखते। बच्चों में हाइपरटेंशन अक्सर बिना लक्षण के होता है। अगर लक्षण दिखता भी है तो उनमें सिरदर्द, चक्कर आना, थकान, नज़र की समस्या, नाक से खून आना या ध्यान केंद्रित करने में मुश्किल होने जैसे समस्याएं शामिल हो सकती है, वहीं गंभीर हाइपरटेंशन से सीने में दर्द, सांस लेने में तकलीफ या दौरे पड़ सकते हैं। ऐसे में मैं रेगुलर ब्लड प्रेशर स्क्रीनिंग की सलाह दूंगी, खासकर हाई-रिस्क बच्चों के लिए यह काफी जरूरी है क्योंकि शुरुआती स्टेज में अक्सर लक्षण नहीं दिखते।

बच्चों में हाइपरटेंशन को कैसे रोका और मैनेज किया जा सकता है ?

बच्चों में हाइपरटेंशन की रोकथाम और मैनेजमेंट के लि वज़न संतुलित रखने, कम नमक वाला बैलेंस्ड डाइट लेने, रेगुलर फिजिकल एक्टिविटी करने और स्क्रीन टाइम कम करने पर ध्यान देना जरूरी है। साथ ही किसी अंदरूनी मेडिकल कंडीशन का इलाज करना भी उतना ही ज़रूरी है। अगर लाइफस्टाइल में बदलाव के बाद भी स्थिति में सुधार नहीं होती है तो ऐसी स्थिति में केवल मेडिकल देखरेख में ही दवाएं दें। खुद के नुस्खे अपनाने में बेहतर है कि इस मामले में डॉक्टर की सलाह लें।

क्या हम बच्चों में ब्लड प्रेशर चेक करने के लिए कोई भी BP मापने वाली मशीन इस्तेमाल कर सकते हैंनहीं, बच्चों के ब्लड प्रेशर मापने के लिए खास BP कफ, शांत माहौल और अलग-अलग विज़िट में कई रीडिंग की ज़रूरत होती है। बड़ों के उलट, बच्चों का ब्लड प्रेशर उम्र, जेंडर और हाइट के आधार पर पर्सेंटाइल चार्ट का इस्तेमाल करके निकाला जाता है, न कि किसी एक फिक्स्ड नंबर का। सही कफ साइज़ का इस्तेमाल करना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि बड़ों के कफ या बिना वैलिडेशन वाली मशीनों से गलत या गलत रीडिंग आ सकती है।

माता-पिता के लिए कुछ जरूरी टिप्स

बच्चों में हाइपरटेंशन को रोकने में माता-पिता की अहम भूमिका होती है। बच्चों को बाहर खेलने और रेगुलर फिजिकल एक्टिविटी के लिए बढ़ावा देने से हेल्दी वज़न और दिल की सेहत बनाए रखने में मदद मिलती है। पौष्टिक, घर का बना खाना देना और नमकीन, पैकेज्ड और फास्ट फूड कम देना, रिस्क फैक्टर को काफी कम कर सकता है। स्क्रीन टाइम पर नज़र रखना और उसे कम करना, रेगुलर हेल्थ चेक-अप करवाना और बच्चों के रेगुलर विज़िट के दौरान अपने बच्चे का ब्लड प्रेशर चेक करवाना भी ज़रूरी है, खासकर अगर उन्हें ज़्यादा रिस्क है।

डॉ. आकांक्षा अरोड़ा के साथ अपॉइंटमेंट बुक करने के लिए यहां क्लिक करें। अगर बच्चों के हाइपरटेंशन से जुड़ा कोई खास सवाल आपके पास भी है, तो कृपया अपने नजदीकी उजाला सिग्नस हॉस्पिटल से संपर्क करें या हमारे हेल्थ एक्सपर्ट्स से askadoctor@ujalacygnus.comपर संपर्क करें।

FAQs

बच्चों में ब्लड प्रेशर कैसे मापा जाता है?

बच्चों में ब्लड प्रेशर मापने के लिए सही कफ साइज़, शांतिपूर्ण माहौल और कई रीडिंग की ज़रूरत होती है। अगर किसी बच्चे में हाई ब्लड प्रेशर पाया जाता है, तो डॉक्टर बार-बार BP मापने, ब्लड और यूरिन टेस्ट, किडनी अल्ट्रासाउंड, इकोकार्डियोग्राफी (दिल की जांच) और लाइफस्टाइल असेसमेंट की सलाह दे सकते हैं। ये टेस्ट यह पता लगाने में मदद करते हैं कि हाइपरटेंशन प्राइमरी है या सेकेंडरी।

बच्चों में हाइपरटेंशन के इलाज क्या हैं?

बच्चों में हाइपरटेंशन के इलाज की पहली लाइन लाइफस्टाइल में बदलाव है। ज़्यादातर बच्चे हेल्दी बदलावों पर अच्छा रिस्पॉन्स देते हैं, जैसे कम नमक वाला बैलेंस्ड डाइट, रेगुलर फिजिकल एक्टिविटी, वेट मैनेजमेंट, स्क्रीन टाइम कम रखना और पूरी नींद। कुछ मामलों में, अगर लाइफस्टाइल में बदलाव के बावजूद ब्लड प्रेशर हाई रहता है, अगर ऑर्गन डैमेज के सबूत हैं, या अगर बच्चे को सेकेंडरी हाइपरटेंशन है, तो दवा की ज़रूरत पड़ सकती है। इसका इलाज हमेशा बच्चे की उम्र, अंदरूनी कारण और पूरी हेल्थ कंडीशन के आधार पर ही होता है।

पीडियाट्रिक हाइपरटेंशन का जल्दी पता लगाना क्यों ज़रूरी है?

अगर बच्चों में हाइपरटेंशन का इलाज न किया जाए, तो इससे भविष्य में गंभीर दिक्कतें हो सकती हैं, जैसे दिल का बढ़ना, किडनी खराब होना, बड़े होने पर हाइपरटेंशन का खतरा बढ़ना और शुरुआती कार्डियोवैस्कुलर बीमारी। जल्दी पता लगाना और समय पर इलाज, ज़िंदगी भर चलने वाली सेहत से जुड़ी दिक्कतों को रोकने और बच्चों में हेल्दी ग्रोथऔर नॉर्मल डेवलपमेंट पक्का करने में बहुत ज़रूरी भूमिका निभाते हैं।

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